ऐ मेरे बचपन ,कैसे भूलूँ तेरी यादें
क्या क्या याद करुँ,अनगिनत यादें
एक मौसी ,जो छोटी कहलाती थी
पर मुझ से पांच साल बड़ी थी
मेरी बेस्ट फ्रेंड ,मुझे खूब घुमाती थी
में पांच ,वो दस ,मिल कर
पंद्रह साल का धमाल मचाती थी !
वो इंजन ,में डिब्बा ,खुद ट्रैन खुद यात्री
पहले चपत लगाती,फिर प्यार करती
में रूठता वो मनाती,में मनाता तो नखरे करती .
उसकी बहिन लाली ,हुक्के की निगाली..
कुछ मोटी, कुछ काली ,मुछड मौसा की घरवाली .
नानी की अँधेरी कोठरी में,दिए की रौशनी में
मेरे लिए दोनों मिल कर चाय बनाती
वो अमृत ,फिर नहीं मिला ,तमाम टी बैग्स की कसम
उनके पिता को में मामा कहता
उनके कंधे पर चढ़ कर ,इटावा की नुमायश घूमता
टिकसी मंदिर जाता और छेराहे के नन्हे मुन्ने समोसे खाता
एक परात जैसे पेट वाला हलवाई समोसे बनाता
में उसे खूब चिढ़ाता ,वो चिढ़ता तो में खुश हो जाता
इटावा की बसौंधी ,मेरी नानी की प्रिय वस्तु
छोटी मौसी खा जाती फिर में उनकी पिटाई करता
केरोसीन की लालटेनकी वो गंध ,अभी भी जैसे बाकी है
सारे deo के ऊपर बचपन की गंध अभी बाकी है
क्या क्या याद करुँ,अनगिनत यादें
एक मौसी ,जो छोटी कहलाती थी
पर मुझ से पांच साल बड़ी थी
मेरी बेस्ट फ्रेंड ,मुझे खूब घुमाती थी
में पांच ,वो दस ,मिल कर
पंद्रह साल का धमाल मचाती थी !
वो इंजन ,में डिब्बा ,खुद ट्रैन खुद यात्री
पहले चपत लगाती,फिर प्यार करती
में रूठता वो मनाती,में मनाता तो नखरे करती .
उसकी बहिन लाली ,हुक्के की निगाली..
कुछ मोटी, कुछ काली ,मुछड मौसा की घरवाली .
नानी की अँधेरी कोठरी में,दिए की रौशनी में
मेरे लिए दोनों मिल कर चाय बनाती
वो अमृत ,फिर नहीं मिला ,तमाम टी बैग्स की कसम
उनके पिता को में मामा कहता
उनके कंधे पर चढ़ कर ,इटावा की नुमायश घूमता
टिकसी मंदिर जाता और छेराहे के नन्हे मुन्ने समोसे खाता
एक परात जैसे पेट वाला हलवाई समोसे बनाता
में उसे खूब चिढ़ाता ,वो चिढ़ता तो में खुश हो जाता
इटावा की बसौंधी ,मेरी नानी की प्रिय वस्तु
छोटी मौसी खा जाती फिर में उनकी पिटाई करता
केरोसीन की लालटेनकी वो गंध ,अभी भी जैसे बाकी है
सारे deo के ऊपर बचपन की गंध अभी बाकी है

![Photo: २८ अप्रैल २०१४ ...आज की मेरी कविता
डॉ प्रमोद कुमार दीक्षित [इस कविता का किसी जीवित ,मृत या अधमरे व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं हे,और हाथी किसी दल विशेष का प्रतीक नहीं है,सत्ता का प्रतीक मात्र है ]
============इतिहास ऐसे पढ़ो न =============
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ग़ज़नवी मरते नहीं ,तमाम रूहों में रहते हैं
दिलों को तोड़ने वाले ज़माने में खूब होते हैं ....
अशोक महान भी चारों ओर दिखाई देते हैं
कत्लेआम के बाद धर्माचार्य बन जाते हैं......
हर्षवर्धनो की कोई कमी नहीं ज़माने में
जनता का पैसा धरम के नाम लूटा देते हैं ....
तुग़लक़ तो इंतजामिया में बिखरे पड़े हैं
बिना सोचे फरमान जारी किये जाते हैं .....
मुग़ल भी चारो ओर देखो बहुत से हैं
अपने भाइयो को मार कर राज कर रहे हैं .....
मुहम्मदशाह रंगीलो को अब देख लेना
दरबार में नाच रंग एक बार फिर देख लेना
अँगरेज़ तो गए ही नहीं,हमारी रूह में समां गए
काली चमड़ी में गोरे संस्कार लिए हम ही तो हैं
सरकार में आते ही आम आदमी को पीसनेवाले
सब्ज़बाग़ दिखा कर सीने पर सवार हम ही तो हैं !](https://fbcdn-sphotos-e-a.akamaihd.net/hphotos-ak-frc3/t1.0-9/1901928_733920253296416_8529529228230205335_n.jpg)
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